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गुरुवार, 23 जनवरी 2020
< audio > और < video > टॅग(tag) के बारे मे जानकारी हिंदी मे (IN HINDI)
< article > और < p > टॅग(tag) के बारे जानकारी हिंदी मे (IN HINDI)
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< article > और < p > टॅग के बारे जानकारी
__ __
:-
यह दोनो टॅग किसी वाक्य या परिच्छेद को लिखने के लिए किया जाता है आप इन दोनो को अलग अलग भी उपयोग कर सकते है। इसका कोड नीचे दिया गया है आप नीचे दिए गए कोड को HTML EDITOR मे रन करके देखे।
here you learn html in hindi language.
if you have doubt comment us on bottom.
__
:-here you learn html in hindi language.
if you have doubt comment us on bottom.
< address > TAG के बारे मे जाने IN HINDI (हिंदी मे)
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< address > tag के बारे मे जानकारी
__ :-
यह टॅग पता लिखने के लिए उपयोग किया जाता है यह कैसे लिखा जाता है इसका कोड हम नीचे दिया गया है और आप इसे नीचे दिए गए HTML EDITOR पर रन कर सकते है।
TATA COMPANY LTD,
pune-satara road,
pune-46.
pune-satara road,
pune-46.
< abbr > और < acronym > टॅग के बारे जानकारी हिंदी मे(< abbr > and < acronym > tag details in hindi) - knowledge in maatrabhasha
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< abbr > और < acronym > टॅग के बारे जानकारी हिंदी मे(< abbr > and < acronym > tag details in hindi)
1) __ and __ :-
यह टॅग तब उपयोग किया जाता है जब हमने कीसी वाक्य को शॉर्ट फॉर्म मे लिखा हो और हम चाहते है की यदि इसपर माउस को लाया जाए तो यह फुल फॉर्म मे दिखाई देगा।
हम आपको इसका कोड नीचे दिखा रहे है आप इस कोड को ब्राउजर मे रन करके देखे।
this website's short form is
kim .
ऊपर दिए हुए कोड को आप नीचे दिए गए HTML EDITOR लिखे या पेस्ट करे और रन करे।
हम आपको इसका कोड नीचे दिखा रहे है आप इस कोड को ब्राउजर मे रन करके देखे।
this website's short form is
kim .
मंगलवार, 21 जनवरी 2020
HTML मे उपयोग होनेवाले < a > एलेमेंट के बारे मे जानकारी (Information on < a > Element Of HTML) - knowledge in maatrabhasha
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HTML मे उपयोग होनेवाले < a > एलेमेंट के बारे मे जानकारी (Information on < a > Element/tag Of HTML)
आज हम आपको < a > एलेमेंट अथवा टॅग के बारे मे बतानेवाले है जैसे की वह क्या करता है और उसे कैसे उपयोग किया जाता है तो चलिए जानते है इस टॅग के बारे मे :-
1) __ :- यह एक शब्द को लिंक मे बदल देता है जैसे की आप कीसी वेबसाइट पर गए होंगे तो आपको कई बार यह लिखा हुआ दिखाई देता होगा कि यहाँ पर क्लिक करे और अगली पोस्ट पर या लेख पर जाए और आपके उस शब्द या स्थान को क्लिक करते ही आप दुसरी वेबसाइट या पोस्ट पर चले जाते है या आपको यह कहाँ जाता है की यहाँ दबाकर डाउनलोड करे वहाँ इसी टॅग का उपयोग किया गया होता है यह एक पुरा एलेमेंट होता है। इसमे href="" का उपयोग किया जाता है यह एक एट्रिब्युट है जिसे इस टॅग मे लगाया जाता है और उसमे वेबसाइट या किसी अन्य युआरएल को डाला जाता है और उसके बाद टॅग को बंद करके कुछ भी लिखा जाता है या लिख सकते है और आप जो लिखते वह दर्शको को दिखाई देता है और जब आप उसे क्लिक करते है तो सर्वर आपको उस वेबसाइट के लिंक पर भेज देता है। हम आपको इसका एक कोड दिखाते है की यह किया जाता है यह आसान होता है।
आप इसे नोटपॅड या किसी अन्य इडीटर मे इस कोड को रन करके देखे।
इसमे और भी एट्रिब्युट होते है वह आपके लिए बहुत ही फायदेमंद होते है जैसे की href="" होता है वैसे ही src="" होता है आप इसे भी उपयोग कर सकते है। इसमे आप target="" का उपयोग कर सकते है। target="" के पांच वाल्यु या मुल्य होते है इसके आलावा आप इसमे कुछ भी लिख देंगे तो भी यह कार्य नही करेगा वह पांच इस प्रकार है :-
_self
अगर आप इसे लिखते है तो सर्वर दिया हुआ लिंक उसी पेज पर लोड करेगा
_blank
यह आपके दिए लिंक को दुसरे पेज या विंडो पर जाकर खुलेगा
_parent
इसे लगाते है तो यह अपने से जुडे फ्रेम के खुलेगा
_top
इसे लगाते है तो यह उपर के पेज या विंडो पर खुलेगा
framename
अगर इसे लगाते है तो यह आपके द्वारा लिंक किए गए डॉक्युमेंट या फ्रेम मे आपके दिए नाम पर खुलेगा
आप नीचे दिए हुए HTML EDITOR मे यह कोड रन करके देखे।
इसमे और भी एट्रिब्युट होते है वह आपके लिए बहुत ही फायदेमंद होते है जैसे की href="" होता है वैसे ही src="" होता है आप इसे भी उपयोग कर सकते है। इसमे आप target="" का उपयोग कर सकते है। target="" के पांच वाल्यु या मुल्य होते है इसके आलावा आप इसमे कुछ भी लिख देंगे तो भी यह कार्य नही करेगा वह पांच इस प्रकार है :-
आप नीचे दिए हुए HTML EDITOR मे यह कोड रन करके देखे।
सोमवार, 20 जनवरी 2020
डिव,क्लास और आईडी क्या है HTML मे (WHAT IS DIV,CLASS AND ID ATTRIBUTE IN HTML) -knowledge in maatrabhasha
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डीव,क्लास और आईडी क्या है HTML मे (What is class and id attribute in HTML)
1) div :- यह HTML मे बहुत आवश्य्क टॅग(tag) है इसे हम सभी जगह पर उपयोग कर सकते है। इसे लगाने से वेबसाइट पर एक जगह बन जाती है जैसे की आपके पास कोई जमीन है और आप उसे टुकडो मे विभाजित करना चाहते हो तो आप बीच मे एक रेखा यानी कि लाईन खीच दोगे जिससे वह दो हिस्सो मे बट जाएगा और यदि आप उन दोनो हिस्सो मे रेखा खिचेंगे तो उसमे और हिस्से हो जाएंगे और आप उन हिस्सो मे अपना कुछ भी बना या निर्माण कर सकते हो ठिक वैसा ही कार्य डिव टॅग(div tag) करता बस अंतर इतना है की इसे आपको वेबसाइट पर करना हो तो उपयोग करते हो । हम आपको इसका उदाहरण एक फोटो देकर दिखाएंगे।
आपने देखा की डिव(div) का क्या करता है। अगर भविष्य मे यदि आपको इनमे बदलाव करना है तो यह बहुत उपयोगी साबित होते है जैसे यदि आप इन वाक्यो के पीछे के जगह को रंग दे सकते है अब आप सोच रहे होंगे की कैसे यह होगा तो हम आपको बता देते है की ऐसा कुछ एट्रिब्युट से कर सकते है जैसे की पीछे की जगह का रंग बदलनेवाला एट्रिब्युट(attribute) जिसे अंग्रेजी मे background-color एट्रिब्युट(attribute) कहते है और हम इसका ही उपयोग करेंगे इसे bgcolor भी लिख सकते है लेकिन कही-कही आपको पुरा नाम भी लिखना पड्ता है यह रंग(colour) देना आकर्षक बनाना यह सीएसएस(css) का हिस्सा है यह HTML मे उपयोग नही किया जाता लेकिन फिर भी हम आपको यह बताएंगे क्योंकी कोई भी वेबसाइट सिर्फ HTML से नही बनाई जा सकती है। हम आपको इसका उदाहरण एक और फोटो द्वारा देंगे।
जैसा की आप देख रहे होंगे की कैसे पीछे की जगह को रंग किया जाता है इसमे आप समझ गए होंगे की कैसे डिव टॅग(div tag) उपयोगी होता है इसका उपयोग आप समूह को बनाने के लिए करे क्योंकी यह बहुत ही आवश्य्क और सीएसएस(css) के लिए यह बहुत उपयोगी होता है अथवा इसका उपयोग करने से आपका वेबसाइट इंटरनेट(internet) पर बहुत जल्दी खुलेगा क्योंकी ब्राउजर(browser) को एक साथ सारी चीजे यानी की कोड(code) को रिड(read) करके दिखाने मे समय लगता है इससे आपकी वेबसाइट तेज होगी।
2) class :- यह एक एट्रिब्युट(attribute) है जिसे सीएसएस(css) मे उपयोग किया जाता है और इसे आप बहुत सारे एलेमेंट(element) को एक साथ सभी मे एक जैसा व्यवहार कराया जाता है। उदाहरण के लिए जैसे किसी पाठशाला मे बहुत सारे विद्याथी होते है जिन्हे अलग-अलग शिक्षा दी जाती है वर्ष और शिक्षा के हिसाब से और उन्हे अलग-अलग नामो से अलग-अलग
किया जाता है जैसे पहली कक्षा,दुसरी,तीसरी और चौथी कक्षा और यदि उस पाठशाला के प्रधानाचार्य को पहली के छात्रो को छुट्टी देना है तो वह पहली कक्षा का नाम लेंगे और पहली कक्षा मे जितने भी छात्र होंगे उनकी छुट्टी कर दी जाएगी ठिक वैसे ही इसका कार्य होता है यदि आपने बहुत सारी कोडिंग(coding) की है वेबसाइट के लिए और आपको वेबसाइट मे बदलाव करना है और आप चाहते हो की कुछ ही कोडिंग(coding) मे बदलाव हो तो ऐसे मे क्लास(class) इस एट्रिब्युट(attribute) उपयोग किया जाता है इसे आपको डिव टॅग के अंदर क्लास(class) लिखकर उसका कोई मुल्य दे दे और इसे आप बाद मे स्टाईल टॅग(style tag) को हेड टॅग(head tag) के अंदर टाईप(type) करना है और उसमे क्लास(class) का नाम लिखकर उसी के पास मे कोष्ट्क(bracket) बनाकर उसमे लिखना होता है और वह कोड आपने जिस-जिस कोड मे वह क्लास और उसका मुल्य होगा उसमे बदलाव हो जाएगा इससे समय और मेहनत बचती है और ज्यादा कोड नही करना पडता है एक बार लिखने के बाद सभी पर एक साथ प्रभाव होता है।
इस कोड को आप देखकर समझ ही गए होंगे की कैसे क्लास टॅग का उपयोग किया जाता है और अब इसे रन करने के बाद कुछ ऐसा परिणाम आता है।
3) id :- आईडी(id) का उपयोग भी क्लास(class) की तरह ही है अब हम आपको उदाहरण द्वारा समझाते है जैसे की आपने पाठशाला का उदाहरण देखा होगा अब उसे ही यहाँ आगे बढा रहे है प्रधानाचार्य ने पहली कक्षा के छात्रो को छुट्टी दे दी लेकिन अब प्रधानाचार्य उस कक्षा से एक छात्र को छुट्टी नही दे रहे है तो प्रधानाचार्य को यह बात उस छात्र हो कहनी है तो वह कैसे कहेंगे प्राधानाचार्य उस कक्षा मे स्थित उस छात्र का नाम लेंगे और कहेंगे ठिक वैसे ही आईडी(id) का कार्य होता है इसे वैसे ही लिखा जाता है जैसे क्लास(class) को लिखा जाता है इसे स्टाईल टॅग(style tag) मे दर्शाने के लिए # इस चिन्ह का उपयोग करते है। उदाहरण के लिए फोटो देखे।
इस प्रकार आईडी टॅग(id tag) का उपयोग किया जाता है आप आईडी(id) मे कुछ भी नाम दे सकते है कोई विशेष नाम नही दिया जाता है इसमे कुछ भी नाम दे सकते है और क्लास(class) मे भी इसी प्रकार होता है। हम इस कोड का परिणाम(result) दिखा देते है।
इसी प्रकार इनका उपयोग होता है और यह बहुत जरुरी विषय है HTML मे।
आपने देखा की डिव(div) का क्या करता है। अगर भविष्य मे यदि आपको इनमे बदलाव करना है तो यह बहुत उपयोगी साबित होते है जैसे यदि आप इन वाक्यो के पीछे के जगह को रंग दे सकते है अब आप सोच रहे होंगे की कैसे यह होगा तो हम आपको बता देते है की ऐसा कुछ एट्रिब्युट से कर सकते है जैसे की पीछे की जगह का रंग बदलनेवाला एट्रिब्युट(attribute) जिसे अंग्रेजी मे background-color एट्रिब्युट(attribute) कहते है और हम इसका ही उपयोग करेंगे इसे bgcolor भी लिख सकते है लेकिन कही-कही आपको पुरा नाम भी लिखना पड्ता है यह रंग(colour) देना आकर्षक बनाना यह सीएसएस(css) का हिस्सा है यह HTML मे उपयोग नही किया जाता लेकिन फिर भी हम आपको यह बताएंगे क्योंकी कोई भी वेबसाइट सिर्फ HTML से नही बनाई जा सकती है। हम आपको इसका उदाहरण एक और फोटो द्वारा देंगे।
जैसा की आप देख रहे होंगे की कैसे पीछे की जगह को रंग किया जाता है इसमे आप समझ गए होंगे की कैसे डिव टॅग(div tag) उपयोगी होता है इसका उपयोग आप समूह को बनाने के लिए करे क्योंकी यह बहुत ही आवश्य्क और सीएसएस(css) के लिए यह बहुत उपयोगी होता है अथवा इसका उपयोग करने से आपका वेबसाइट इंटरनेट(internet) पर बहुत जल्दी खुलेगा क्योंकी ब्राउजर(browser) को एक साथ सारी चीजे यानी की कोड(code) को रिड(read) करके दिखाने मे समय लगता है इससे आपकी वेबसाइट तेज होगी।
2) class :- यह एक एट्रिब्युट(attribute) है जिसे सीएसएस(css) मे उपयोग किया जाता है और इसे आप बहुत सारे एलेमेंट(element) को एक साथ सभी मे एक जैसा व्यवहार कराया जाता है। उदाहरण के लिए जैसे किसी पाठशाला मे बहुत सारे विद्याथी होते है जिन्हे अलग-अलग शिक्षा दी जाती है वर्ष और शिक्षा के हिसाब से और उन्हे अलग-अलग नामो से अलग-अलग किया जाता है जैसे पहली कक्षा,दुसरी,तीसरी और चौथी कक्षा और यदि उस पाठशाला के प्रधानाचार्य को पहली के छात्रो को छुट्टी देना है तो वह पहली कक्षा का नाम लेंगे और पहली कक्षा मे जितने भी छात्र होंगे उनकी छुट्टी कर दी जाएगी ठिक वैसे ही इसका कार्य होता है यदि आपने बहुत सारी कोडिंग(coding) की है वेबसाइट के लिए और आपको वेबसाइट मे बदलाव करना है और आप चाहते हो की कुछ ही कोडिंग(coding) मे बदलाव हो तो ऐसे मे क्लास(class) इस एट्रिब्युट(attribute) उपयोग किया जाता है इसे आपको डिव टॅग के अंदर क्लास(class) लिखकर उसका कोई मुल्य दे दे और इसे आप बाद मे स्टाईल टॅग(style tag) को हेड टॅग(head tag) के अंदर टाईप(type) करना है और उसमे क्लास(class) का नाम लिखकर उसी के पास मे कोष्ट्क(bracket) बनाकर उसमे लिखना होता है और वह कोड आपने जिस-जिस कोड मे वह क्लास और उसका मुल्य होगा उसमे बदलाव हो जाएगा इससे समय और मेहनत बचती है और ज्यादा कोड नही करना पडता है एक बार लिखने के बाद सभी पर एक साथ प्रभाव होता है।
इस कोड को आप देखकर समझ ही गए होंगे की कैसे क्लास टॅग का उपयोग किया जाता है और अब इसे रन करने के बाद कुछ ऐसा परिणाम आता है।
3) id :- आईडी(id) का उपयोग भी क्लास(class) की तरह ही है अब हम आपको उदाहरण द्वारा समझाते है जैसे की आपने पाठशाला का उदाहरण देखा होगा अब उसे ही यहाँ आगे बढा रहे है प्रधानाचार्य ने पहली कक्षा के छात्रो को छुट्टी दे दी लेकिन अब प्रधानाचार्य उस कक्षा से एक छात्र को छुट्टी नही दे रहे है तो प्रधानाचार्य को यह बात उस छात्र हो कहनी है तो वह कैसे कहेंगे प्राधानाचार्य उस कक्षा मे स्थित उस छात्र का नाम लेंगे और कहेंगे ठिक वैसे ही आईडी(id) का कार्य होता है इसे वैसे ही लिखा जाता है जैसे क्लास(class) को लिखा जाता है इसे स्टाईल टॅग(style tag) मे दर्शाने के लिए # इस चिन्ह का उपयोग करते है। उदाहरण के लिए फोटो देखे।
इस प्रकार आईडी टॅग(id tag) का उपयोग किया जाता है आप आईडी(id) मे कुछ भी नाम दे सकते है कोई विशेष नाम नही दिया जाता है इसमे कुछ भी नाम दे सकते है और क्लास(class) मे भी इसी प्रकार होता है। हम इस कोड का परिणाम(result) दिखा देते है।
इसी प्रकार इनका उपयोग होता है और यह बहुत जरुरी विषय है HTML मे।
शुक्रवार, 17 जनवरी 2020
HTML सीखे हिंदी मे (LEARN HTML BASICS IN HINDI) - Knowledge in maatrabhasha
अगर आप इस पोस्ट या वेबसाइट से जुडे अपडेट देखना चाहते है या इस वेबसाइट के नए पोस्ट देखना चाहते है
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HTML सीखे हिंदी मे (LEARN HTML IN HINDI)
HTML के बारे मे
HTML यह भाषा एक हाईपर टेक्स्ट मार्कअप भाषा(hyper text markup language) है जिससे वेबसाइट का निर्माण करने के लिए किया जाता है
और यह एक बहुत ही आसान भाषा है जिसे वेबसाइट बनाने के लिए सबसे पहले सीखना चाहिए।
आप यह भाषा सीखने आप कम्प्युटर मे नोटपॅड(notepad) या नोटपॅड++(notepad++) का उपयोग कर सकते है या यदि आप इसे पहली सीख रहे है तो आप इन्ही का उपयोग करे। अगर आप एक वेबसाइट बनाते है तो आपको तीन भाषाओ का ज्ञान थोडा बहुत तो होना ही चाहिए। वेबसाइट बनाने के HTML यह एक ढांचे का काम करता है जैसे की वेबसाइट का रंग और उसपर मौजुद कोई चित्र(image) कहाँ लगाना है उसमे मदद करता है यह ऐसा है जैसे की कोई शरीर बिना हड्डी के ढांचे(skeleton) बिना नही होता वैसे ही यह होता है बाद मे इसे आकर्षक बनाने के लिए सीएसएस(CSS) का उपयोग करते है जिससे एक वेबसाइट आकर्षक(responsive,attractive) दिखती है और यदि आप अपनी वेबसाइट को और अच्छा दिखाना चाहते है तो आपको जावास्क्रिप्ट(JAVASCRIPT) की जरुरत होगी। किसी वेबसाइट को दो भाषाओ द्वारा भी बनाया जाता है और वह HTML और CSS है इनसे किया जाता है।
HTML मे जो भी अक्षर या शब्द < > मे होता है वह चालू टॅग(opening tag) होता है और इसका एक बंद टॅग(closing tag) होता है जिसे < / > इस प्रकार दर्शाया जाता है इसके अलावा कुछ और टॅग भी होते है जिसे बंद टॅग की जरुरत नही होती है इसके बारे मे हम आपको बाद मे बतायेंगे अभी हम आपको इसके मुल यानी की बॅसिक(basic) के बारे मे बतानेवाले है।

अब आप जैसे ऊपर कुछ और टॅग दर्शाए गए है हम आपको एक-एक करके बतानेवाले है।
1)< !doctype html > :- आपने यह चित्र मे सबसे ऊपर देखा ही होगा यह किसी भी वेबसाइट(website) मे लगता ही लगता है जब वह HTML का होता है तो और HTML यह सभी वेबसाइट मे लगाना ही पडता है इससे यह पता चलता है सर्वर(server) को की यह जो डॉक्युमेंट(document) है वह HTML का है इसमे !doctype लिखकर HTML लिखना होता है आप जब HTML लिखते है तो सर्वर को यह पता चलता है की यह डॉक्युमेंट HTML भाषा मे है। यह टॅग़ आपको हमेशा शुरुआत मे ही लिखना होता है।
2) html :- यह टॅग आपने चित्र मे देखा है अब हम आपको इसका मतलब बताते है यह टॅग़ HTML को शुरुआत को दर्शाता है की जो भी प्रोग्रामिंग कोड है आपको इसके अंदर लिखना है यदि आप इस टॅग के बाहर आप जो भी कोड(code) लिखेंगे तो वह आपकी वेबसाइट पर दिखाई नही देगा आपको इसके अंदर ही लिखना है। यह टॅग जहाँ शुरु हो रहा है और जहाँ यह बंद हो रहा है उसके अंदर ही लिखना होगा। जैसा की यहाँ बताया गया है < html > चालू टॅग है और इसे बंद करने के लिए < / html > है।
3) head :- < head > यह टॅग भी आपको सबसे ऊपर लिखना है और यह ऊपर ही लगाया जाता है। यह इसलिए लिखना है जैसे की आप किसी शरीर का चित्र बना रहे है तो आप कभी-भी सिर(head) से शुरु करते है वैसे ही यहाँ पर भी आप head टॅग का उपयोग करके सिर से शुरु करना है और आप इसमे आपको इसके अंदर कुछ और शब्द दिखाई दे रह्र होंगे जैसे की meta यह HTML डॉक्युमेंट के बारे मे दर्शाता है और इसमे जो charset="utf-8" लिखा है वह यह बताता है की आपका जो डॉक्युमेंट है उसमे सभी भाषाओ(languages) का उपयोग हो रहा है इसमे charset कीसी भाषा को दर्शाने के लिए उपयोग किया जाता है और utf-8 का अर्थ है सभी भाषा यानी की आपको सभी भाषाओ का उपयोग अपने डॉक्युमेंट मे करना है तो इसे ही लिखना होगा। अब आप title टॅग देख रहे होंगे यह अपके डॉक्युमेंट का टाईटल(title) यानी की शीर्षक(heading) लिखने के लिए उपयोग किया जाता है और आपके डॉक्युमेंट का नाम आपको देना होगा वह आप इसके अंदर लिखना होता है और यह किस प्रकार दिखाई देता है उसे हम आपको एक फोटो मे दिखाएंगे। इन दोनो टॅग(head,title) को यदि आप चालु करते है तो उसे बंद भी करना पडता है हमने फोटो मे किया है और meta टॅग यह खुला हुआ टॅग(opening tag) है इसे बंद नही करना पड्ता है ।
जैसा की आपने देखा ऊपर फोटो मे की < title > html code < / title > लिखने पर वह कहा आता है और आपका डॉक्युमेंट(document) जिस किसी भी विषय पर है यहाँ पर आपको थोडा-सा बताना पडता है जैसे की आप किसी कहानी या पाठ का नाम लिखते है यह वैसा ही है।
3) body :- यह टॅग बहुत जरुरी टॅग है जब भी हमे वेबसाइट के पेजपर कुछ दर्शाना होता है तो हम उसे इसके अंदर लिखते है। यह टॅग और ऊपर दिए गए सभी टॅग(tag) बहुत ही आवश्यक और है,जबतक हम इस टॅग का उपयोग या इसे लगाते नही तब तक हमे वेबसाइट(website) पर कुछ दिखाई ही नही देगा और लगाने के बाद हम जो चाहे वह वेबसाइट पर दिखा सकते है इस टॅग को भी बंद करना पडता है । हम आपको एक और फोटो द्वारा उदाहरण देते है की कैसे यह होता है।
अब हम आपको एट्रिब्युट(attribute) और इलेमेंट(element) के बारे मे बतानेवाले है हम आपको यह नीचे दिए गए फोटो(image) मे यह दर्शाने वाले है।
5) element :- हम टॅग को ही इलेमेंट(element) कहते है और एक टॅग(TAG) के अंदर बहुत सारे टॅग(tag) हो सकते है या होते है और जिसे हम चालु टॅग(opening tag) कहते है जिसका कोई बंद टॅग(closing tag) नही होता है उसे यहाँ empty element कहते है।
6) attribute :- जिसे हम टॅग के अंदर लिखते है उसे हम attribute कहते है जैसा की फोटो मे दिया गया है उसे ही attribute कहते है और इसका एक मुल्य होता है जिसे इसके अंदर लिखा जाता है यह कुछ भी हो सकता है जैसे यह अक्षर,संख्या वाक्य भी हो सकता है जिसे वॅल्यु(value) अथवा हिंदी मे गुण कहते है इसे आप गुण कह सकते है जैसे की किसी इंसान कि मोटाई ज्यादा होती है किसी की लंबाई ज्यादा होती है और कोई मानव विशेष गुणो से सपन्न होता है ठिक वैसे ही यह attribute होता है इसका उपयोग करके आप किसी भी टॅग मे इसका उपयोग करके उसे मन चाहा आकार दे सकते है और भी बहुत कुछ करवा सकते है। width यह एक attribute या गुण का नाम है जिसे आप किसी टॅग की मोटाई बढाने या उसे मोटाई दे सकते है वैसे ही height होता है जिससे आप लम्बाई दे सकते हो आपको बस यह इस प्रकार लिखना होता है width="100px" जैसे की बताया गया आपको attribute का नाम लिखकर उसमे उसका आकार लिखना होगा कि वह कितना बडा होगा जैसे की 100ps,50px,500px आप जितना चाहे उतना दे सकते है।
HTML मे जो भी अक्षर या शब्द < > मे होता है वह चालू टॅग(opening tag) होता है और इसका एक बंद टॅग(closing tag) होता है जिसे < / > इस प्रकार दर्शाया जाता है इसके अलावा कुछ और टॅग भी होते है जिसे बंद टॅग की जरुरत नही होती है इसके बारे मे हम आपको बाद मे बतायेंगे अभी हम आपको इसके मुल यानी की बॅसिक(basic) के बारे मे बतानेवाले है।
अब आप जैसे ऊपर कुछ और टॅग दर्शाए गए है हम आपको एक-एक करके बतानेवाले है।
1)< !doctype html > :- आपने यह चित्र मे सबसे ऊपर देखा ही होगा यह किसी भी वेबसाइट(website) मे लगता ही लगता है जब वह HTML का होता है तो और HTML यह सभी वेबसाइट मे लगाना ही पडता है इससे यह पता चलता है सर्वर(server) को की यह जो डॉक्युमेंट(document) है वह HTML का है इसमे !doctype लिखकर HTML लिखना होता है आप जब HTML लिखते है तो सर्वर को यह पता चलता है की यह डॉक्युमेंट HTML भाषा मे है। यह टॅग़ आपको हमेशा शुरुआत मे ही लिखना होता है।
2) html :- यह टॅग आपने चित्र मे देखा है अब हम आपको इसका मतलब बताते है यह टॅग़ HTML को शुरुआत को दर्शाता है की जो भी प्रोग्रामिंग कोड है आपको इसके अंदर लिखना है यदि आप इस टॅग के बाहर आप जो भी कोड(code) लिखेंगे तो वह आपकी वेबसाइट पर दिखाई नही देगा आपको इसके अंदर ही लिखना है। यह टॅग जहाँ शुरु हो रहा है और जहाँ यह बंद हो रहा है उसके अंदर ही लिखना होगा। जैसा की यहाँ बताया गया है < html > चालू टॅग है और इसे बंद करने के लिए < / html > है।
3) head :- < head > यह टॅग भी आपको सबसे ऊपर लिखना है और यह ऊपर ही लगाया जाता है। यह इसलिए लिखना है जैसे की आप किसी शरीर का चित्र बना रहे है तो आप कभी-भी सिर(head) से शुरु करते है वैसे ही यहाँ पर भी आप head टॅग का उपयोग करके सिर से शुरु करना है और आप इसमे आपको इसके अंदर कुछ और शब्द दिखाई दे रह्र होंगे जैसे की meta यह HTML डॉक्युमेंट के बारे मे दर्शाता है और इसमे जो charset="utf-8" लिखा है वह यह बताता है की आपका जो डॉक्युमेंट है उसमे सभी भाषाओ(languages) का उपयोग हो रहा है इसमे charset कीसी भाषा को दर्शाने के लिए उपयोग किया जाता है और utf-8 का अर्थ है सभी भाषा यानी की आपको सभी भाषाओ का उपयोग अपने डॉक्युमेंट मे करना है तो इसे ही लिखना होगा। अब आप title टॅग देख रहे होंगे यह अपके डॉक्युमेंट का टाईटल(title) यानी की शीर्षक(heading) लिखने के लिए उपयोग किया जाता है और आपके डॉक्युमेंट का नाम आपको देना होगा वह आप इसके अंदर लिखना होता है और यह किस प्रकार दिखाई देता है उसे हम आपको एक फोटो मे दिखाएंगे। इन दोनो टॅग(head,title) को यदि आप चालु करते है तो उसे बंद भी करना पडता है हमने फोटो मे किया है और meta टॅग यह खुला हुआ टॅग(opening tag) है इसे बंद नही करना पड्ता है ।
जैसा की आपने देखा ऊपर फोटो मे की < title > html code < / title > लिखने पर वह कहा आता है और आपका डॉक्युमेंट(document) जिस किसी भी विषय पर है यहाँ पर आपको थोडा-सा बताना पडता है जैसे की आप किसी कहानी या पाठ का नाम लिखते है यह वैसा ही है।
3) body :- यह टॅग बहुत जरुरी टॅग है जब भी हमे वेबसाइट के पेजपर कुछ दर्शाना होता है तो हम उसे इसके अंदर लिखते है। यह टॅग और ऊपर दिए गए सभी टॅग(tag) बहुत ही आवश्यक और है,जबतक हम इस टॅग का उपयोग या इसे लगाते नही तब तक हमे वेबसाइट(website) पर कुछ दिखाई ही नही देगा और लगाने के बाद हम जो चाहे वह वेबसाइट पर दिखा सकते है इस टॅग को भी बंद करना पडता है । हम आपको एक और फोटो द्वारा उदाहरण देते है की कैसे यह होता है।
अब हम आपको एट्रिब्युट(attribute) और इलेमेंट(element) के बारे मे बतानेवाले है हम आपको यह नीचे दिए गए फोटो(image) मे यह दर्शाने वाले है।
5) element :- हम टॅग को ही इलेमेंट(element) कहते है और एक टॅग(TAG) के अंदर बहुत सारे टॅग(tag) हो सकते है या होते है और जिसे हम चालु टॅग(opening tag) कहते है जिसका कोई बंद टॅग(closing tag) नही होता है उसे यहाँ empty element कहते है।
6) attribute :- जिसे हम टॅग के अंदर लिखते है उसे हम attribute कहते है जैसा की फोटो मे दिया गया है उसे ही attribute कहते है और इसका एक मुल्य होता है जिसे इसके अंदर लिखा जाता है यह कुछ भी हो सकता है जैसे यह अक्षर,संख्या वाक्य भी हो सकता है जिसे वॅल्यु(value) अथवा हिंदी मे गुण कहते है इसे आप गुण कह सकते है जैसे की किसी इंसान कि मोटाई ज्यादा होती है किसी की लंबाई ज्यादा होती है और कोई मानव विशेष गुणो से सपन्न होता है ठिक वैसे ही यह attribute होता है इसका उपयोग करके आप किसी भी टॅग मे इसका उपयोग करके उसे मन चाहा आकार दे सकते है और भी बहुत कुछ करवा सकते है। width यह एक attribute या गुण का नाम है जिसे आप किसी टॅग की मोटाई बढाने या उसे मोटाई दे सकते है वैसे ही height होता है जिससे आप लम्बाई दे सकते हो आपको बस यह इस प्रकार लिखना होता है width="100px" जैसे की बताया गया आपको attribute का नाम लिखकर उसमे उसका आकार लिखना होगा कि वह कितना बडा होगा जैसे की 100ps,50px,500px आप जितना चाहे उतना दे सकते है।
बुधवार, 15 जनवरी 2020
HOW FILM INDUSTRIES MAKING MONEY AND HOW SET THERE NETWORK INTO THEATRE IN HINDI - जानिए फिल्म उद्योग रुपए कैसे कमाता है हिंदी मे
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फिल्मे पैसा कैसे कमाती है(HOW FILM INDUSTRIES MAKING MONEY)
कुल फिल्म बनाने का खर्चा(MOVIE MAKING COST)
फिल्मे बनाने के लिए खर्चा तो होता है अगर कोई शानदार फिल्म बनानी होतो फिल्मो पर खर्चा तो ज्यादा हो ही जाता है अर कभी-कभी फिल्म रिलीज होने बाद भी अपना खर्चा नही निकाल पाती है तो ऐसे मे फिल्म निर्माताओ(PRODUCER) की जेब बहुत बुरी तरह
से कटती है तो ऐसे मे फिल्म निर्माताओ के पास और भी तरिके होते है फिल्मो से पैसे कमाने के तो आज हम आपको इसी के बारे मे बतानेवाले है की फिल्मे पैसे कैसे कमाती है। फिल्म जब बनकर तैयार हो जाती है और जब उसका खर्च बताया जाता है तो
उसमे सभी खर्च होते है जैसे की कलाकार की फिस,शूटिंग के लिए ली गई जगह का किराया,सभी का खाना-पीना और रहने और तो और विज्ञापन और प्रमोशन का खर्च भी मिलाया जाता है।
फिल्म बनने के बाद उसका थियेटर तक का सफर (FILM GOES TO THETRE)
फिल्म बनने के बाद उसे वितरक के पास भेजी जाती है कई निर्माता तो खुद की वितरक(DISTRIBUTING) कंपनी रखते है और एक वितरक(DISTRIBUTOR) थियेटर मालिको के साथ एक समझौता यानी की करारनामा(AGREEMENT) होता है जिसका हर एक थियेटर मालिक पालन करता है उसमे वितरक
का हिस्सा भी दर्शाया गया होता है और इसपर समझौता पक्का होते ही इसकी रिलीज की तारीख और इसे देशभर मे कितनी स्क्रीन(SCREENS) मिली है उसे जनता को बताया जाता है और उसके बाद रिलीज के दिन पर फिल्म रिलीज होती है।
फिल्मे पैसा कैसे कमाती है (HOW MOVIES MAKING MONEY)
फिल्म का मुख्यत: पैसे कमाने का भडार तो थियेटर ही होते है जिनमे दर्शक फिल्म देखने जाते है वहाँ दर्शको(AUDIENCE) को टिकट लेना पडता है और इसी टिकट के जरिए फिल्मे पैसा कमाती है। फिल्मे पैसे कितना कमाएंगी यह फिल्म और उसे मिली स्क्रीन्स पर होता है
जो बहुत असर करता है तो अब टिकटो से पैसे कैसे कमाए जाते है इसपर आते है तो हम आपको एक उदाहरण देते है की समझो यदि कोई फिल्म आपने बना ली और उसका कुल खर्च लगभग 50 करोड हुआ
अब उस फिल्म को देशभर मे 3000 स्क्रीन मिली है जिसमे से सिंगल स्क्रीन थियेटर(SINGLE SCREEN THETRE) 2000 और मल्टिप्लेक्स थियेटर(MULTIPLEX THETRE) 1000 है अब सिंगल और मल्टीप्लेक्स थियेटर मे से वितरक को सिंगल स्क्रीन थियेटर से ज्यादा मुनाफा होता है और उससे थोडा
ज्यादा मुनाफा मल्टीप्लेक्स थियेटर से होता है ऐसा क्यु होता है इसके बारे मे हम आपको आगे बताएंगे अभी जान लेते है फिल्म बनाने की पुरी प्रक्रिया तो जैसे की फिल्म को स्क्रीन्स तो मिल गई तो अब उसे रिलीज कर दिया आपने तो अब आपकी
फिल्म पैसे कैसे कमाती है जान लेते है मान लो 2000 सिंगल स्क्रीन थियेटर मे एक टिकट 100 रुपए की है और कुल मिलाकर उस थियेटर मे 150 सीट है और आपकी फिल्म उस थियेटर मे एक दिन मे 8 बार दिखाई जाती है और रिलीज के दिन
सभी थियेटर की सभी सीट खरिद ली जाती है अथवा थियेटर हाउसफुल हो जाती है और मल्टीप्लेक्स थियेटर की 1000 स्क्रीन है और वहाँ टिकट 150 रुपए और सीट 150 है और पहले दिन थियेटर हाउसफुल होता है और दिन मे फिल्म को 8 बार दिखाया जाता है तो अब हिसाब
करते है आपकी फिल्म ने पहले दिन कितनी कमाई की।
तो 2000 स्क्रीन X 150 सीट = 3,00,000 सीट
3,00,000 X 100 रुपए टिकट = 3,00,00,000 करोड सिंगल स्कीन से और अब इसे 8 बार गुना कर लेते है क्योकी दिन मे 8 बार फिल्म दिखाई गई है
3 करोड X 8 = 24 करोड एक दिन मे कमाई फिल्म ने सिंगल स्कीन थियेटर से अब मल्टिप्लेक्स थियेटर का भी हिसाब लगा लेते है।
तो 1000 स्क्रीन X 150 सीट = 1,50,000 सीट
1,50,000 सीट X 150 रुपए टिकट = 2,25,00,000 लाख यानी की दो करोड पच्चीस लाख रुपए अब इसे 8 बार गुना कर लेते है
2,25,00,000 X 8 = 18,00,00,000 करोड यानी की अट्ठारह करोड होते है अब इन दोनो को जमा कर देते है
24 करोड + 18 करोड = 42 करोड रुपए एक दिन मे आपकी फिल्म ने कमा लिए और
आपकी फिल्म ऐसे ही पुरे ह्फ्तेभर चलती है तो आपकी फिल्म एक हफ्ते मे 294 करोड तक कमाती है यानी की आपके बजट का 6 गुणा ज्यादा पैसा आप कमा लेते है
लेकिन ऐसा नही होता है
कई थियेटर मे फिल्म हाउसफुल नही हो पाती है कभी-कभी फिल्म दर्शको पसंद नही आती है ऐसे मे फिल्म कम कमाई करती है और जितना कमाई करती है उतना आपके पास नही पहुच पाता है तो अब आप सोच रहे होंगे की कैसे।
फिल्म कमाने के बाद किसको कितना पैसा मिलता है(HOW MUCH MONEY GOES TO PRODUCER AND DISTRIBUTOR)
जैसा की हमने बताया की फिल्म कमाई करने के बाद भी पुरा पैसा नही मिलता है तो वह कैसे जानते है जैसे की हमने आपको लेख की शुरुआत मे ही बताया था की थियेटर मालिको का हिस्सा भी होता है और वितरक का भी हिस्सा होता है तो ऐसे मे एक
करारनामा होता है जिसमे वितरक और थियेटर मालिक का हिस्सा होता है और वह हिस्सा एस प्रकार होता है जैसे कोई थियेटर सिंगल स्क्रीन का होता है उसमे लगी फिल्म की कमाई का कुल 70%-90% तक हिस्सा वितरक का होता है और यह हर हफ्ते
बदल जाता है जैसे की पहले हफ्ते मे 70%-90% तक होता है वैसे की दुसरे हफ्ते मे यह भी यह उतना ही होता है सिंगल स्क्रीन थियेटर मे वितरक का हिस्सा हर हफ्ते उतना ही होता है लेकिन कही-कही यह हिस्सा कम ज्यादा भी होता है और अब मल्टीप्लेक्स
थियेटर के बारे मे यहाँ वितरक का हिस्सा हफ्ते दर हफ्ते बदलता ही है ऐसा क्यु होता है यह हम बोनस लेख मे बताएंगे जो काले अक्षरो मे होता है तो मल्टीप्लेक्स थियेटर मे वितरक और थियेटर मलिक का हिस्सा 50% तक दोनो का होता है और दुसरे हफ्ते यह और भी कम हो
जाता है लगभग 42% तक हो जाता है, तीसरे हफ्ते यह और भी कम हो जाता है लगभग 35% और चौथे हफ्ते मे यह और भी कम हो जाता है लगभग 22%-25% तक उसके बाद फिल्म थियेटर मे से हटा दी जाती है।
अब फिल्म मे से किसने कितना कमाया कमाई का कुल 30% तक सरकार को देना पड्ता है मनोरंजन कर का और उसके बचने के बाद वितरक और थियेटर मालिक का हिस्सा होता है जैसा की समझो फिल्म ने 100 करोड कमाई कर ली उसमे से 30% मनोरंजन कर 30 करोड अब बचे 70 करोड जिसमे से वितरक और थियेटर मालिक अपना हिस्सा लेते है करारपत्र के हिसाब से।
वितरक मल्टीप्लेक्स थियेटर से कम हिस्सा लेता है क्योंकी इसमे टिकट महंगी होती है और इन थियेटरो मे सुविधाए भी अच्छी होती है इसलिए यहाँ दर्शक आते है पैसे भी देते है जिसकी वजह से वितरक कम हिस्सा लेता है और कही-कही वितरक की मल्टीप्लेक्स थियेटर मलिको के द्वारा बात नही सुनी जाती क्योंकी थियेटर मलिको के पास अन्य विक्ल्प भी होते है यह भी कारण होता है और वही सिंगल स्क्रीन थियेटर मे एक ही स्क्रीन होती है तो थियेटर मालिको को नई- नई फिल्म ही लगानी पड्ती है इसलिए वहा थियेटर मलिक वितरक की शर्ते मान लेते है और यहा सुविधाए मल्टीप्लेक्स थियेटर के जैसी नई होने के कारण भी होता है।
कई फिल्मो मे फिल्म के निर्माता ही वितरक का कार्य करते है तो फिल्म का पैसा सीधा फिल्म मालिको के पास जाता है और कही-कही फिल्म निर्माता किसी अन्य वितरक को फिल्म भी बेच सकते है ऐसे फिल्म कमाने का लाभ या हानि वितरक ही लेता है। आजकल फिल्म उद्योग मे निर्माता ही वितरक का कार्य करते है। इसके अलावा फिल्मे अपनी फिल्म किसी टीवी चैनल पर फिल्म दिखाने के भी पैसे लेते है और वह अपने फिल्म के संगीत के राईट्स बेचकर भी पैसे कमाते है।
फिल्म बनने के बाद उसका थियेटर तक का सफर (FILM GOES TO THETRE)
फिल्म बनने के बाद उसे वितरक के पास भेजी जाती है कई निर्माता तो खुद की वितरक(DISTRIBUTING) कंपनी रखते है और एक वितरक(DISTRIBUTOR) थियेटर मालिको के साथ एक समझौता यानी की करारनामा(AGREEMENT) होता है जिसका हर एक थियेटर मालिक पालन करता है उसमे वितरक का हिस्सा भी दर्शाया गया होता है और इसपर समझौता पक्का होते ही इसकी रिलीज की तारीख और इसे देशभर मे कितनी स्क्रीन(SCREENS) मिली है उसे जनता को बताया जाता है और उसके बाद रिलीज के दिन पर फिल्म रिलीज होती है।
फिल्मे पैसा कैसे कमाती है (HOW MOVIES MAKING MONEY)
फिल्म का मुख्यत: पैसे कमाने का भडार तो थियेटर ही होते है जिनमे दर्शक फिल्म देखने जाते है वहाँ दर्शको(AUDIENCE) को टिकट लेना पडता है और इसी टिकट के जरिए फिल्मे पैसा कमाती है। फिल्मे पैसे कितना कमाएंगी यह फिल्म और उसे मिली स्क्रीन्स पर होता है जो बहुत असर करता है तो अब टिकटो से पैसे कैसे कमाए जाते है इसपर आते है तो हम आपको एक उदाहरण देते है की समझो यदि कोई फिल्म आपने बना ली और उसका कुल खर्च लगभग 50 करोड हुआ अब उस फिल्म को देशभर मे 3000 स्क्रीन मिली है जिसमे से सिंगल स्क्रीन थियेटर(SINGLE SCREEN THETRE) 2000 और मल्टिप्लेक्स थियेटर(MULTIPLEX THETRE) 1000 है अब सिंगल और मल्टीप्लेक्स थियेटर मे से वितरक को सिंगल स्क्रीन थियेटर से ज्यादा मुनाफा होता है और उससे थोडा ज्यादा मुनाफा मल्टीप्लेक्स थियेटर से होता है ऐसा क्यु होता है इसके बारे मे हम आपको आगे बताएंगे अभी जान लेते है फिल्म बनाने की पुरी प्रक्रिया तो जैसे की फिल्म को स्क्रीन्स तो मिल गई तो अब उसे रिलीज कर दिया आपने तो अब आपकी फिल्म पैसे कैसे कमाती है जान लेते है मान लो 2000 सिंगल स्क्रीन थियेटर मे एक टिकट 100 रुपए की है और कुल मिलाकर उस थियेटर मे 150 सीट है और आपकी फिल्म उस थियेटर मे एक दिन मे 8 बार दिखाई जाती है और रिलीज के दिन सभी थियेटर की सभी सीट खरिद ली जाती है अथवा थियेटर हाउसफुल हो जाती है और मल्टीप्लेक्स थियेटर की 1000 स्क्रीन है और वहाँ टिकट 150 रुपए और सीट 150 है और पहले दिन थियेटर हाउसफुल होता है और दिन मे फिल्म को 8 बार दिखाया जाता है तो अब हिसाब करते है आपकी फिल्म ने पहले दिन कितनी कमाई की।
तो 2000 स्क्रीन X 150 सीट = 3,00,000 सीट
3,00,000 X 100 रुपए टिकट = 3,00,00,000 करोड सिंगल स्कीन से और अब इसे 8 बार गुना कर लेते है क्योकी दिन मे 8 बार फिल्म दिखाई गई है
3 करोड X 8 = 24 करोड एक दिन मे कमाई फिल्म ने सिंगल स्कीन थियेटर से अब मल्टिप्लेक्स थियेटर का भी हिसाब लगा लेते है।
तो 1000 स्क्रीन X 150 सीट = 1,50,000 सीट
1,50,000 सीट X 150 रुपए टिकट = 2,25,00,000 लाख यानी की दो करोड पच्चीस लाख रुपए अब इसे 8 बार गुना कर लेते है
2,25,00,000 X 8 = 18,00,00,000 करोड यानी की अट्ठारह करोड होते है अब इन दोनो को जमा कर देते है
24 करोड + 18 करोड = 42 करोड रुपए एक दिन मे आपकी फिल्म ने कमा लिए और
आपकी फिल्म ऐसे ही पुरे ह्फ्तेभर चलती है तो आपकी फिल्म एक हफ्ते मे 294 करोड तक कमाती है यानी की आपके बजट का 6 गुणा ज्यादा पैसा आप कमा लेते है
लेकिन ऐसा नही होता है
कई थियेटर मे फिल्म हाउसफुल नही हो पाती है कभी-कभी फिल्म दर्शको पसंद नही आती है ऐसे मे फिल्म कम कमाई करती है और जितना कमाई करती है उतना आपके पास नही पहुच पाता है तो अब आप सोच रहे होंगे की कैसे।
फिल्म कमाने के बाद किसको कितना पैसा मिलता है(HOW MUCH MONEY GOES TO PRODUCER AND DISTRIBUTOR)
जैसा की हमने बताया की फिल्म कमाई करने के बाद भी पुरा पैसा नही मिलता है तो वह कैसे जानते है जैसे की हमने आपको लेख की शुरुआत मे ही बताया था की थियेटर मालिको का हिस्सा भी होता है और वितरक का भी हिस्सा होता है तो ऐसे मे एक करारनामा होता है जिसमे वितरक और थियेटर मालिक का हिस्सा होता है और वह हिस्सा एस प्रकार होता है जैसे कोई थियेटर सिंगल स्क्रीन का होता है उसमे लगी फिल्म की कमाई का कुल 70%-90% तक हिस्सा वितरक का होता है और यह हर हफ्ते बदल जाता है जैसे की पहले हफ्ते मे 70%-90% तक होता है वैसे की दुसरे हफ्ते मे यह भी यह उतना ही होता है सिंगल स्क्रीन थियेटर मे वितरक का हिस्सा हर हफ्ते उतना ही होता है लेकिन कही-कही यह हिस्सा कम ज्यादा भी होता है और अब मल्टीप्लेक्स थियेटर के बारे मे यहाँ वितरक का हिस्सा हफ्ते दर हफ्ते बदलता ही है ऐसा क्यु होता है यह हम बोनस लेख मे बताएंगे जो काले अक्षरो मे होता है तो मल्टीप्लेक्स थियेटर मे वितरक और थियेटर मलिक का हिस्सा 50% तक दोनो का होता है और दुसरे हफ्ते यह और भी कम हो जाता है लगभग 42% तक हो जाता है, तीसरे हफ्ते यह और भी कम हो जाता है लगभग 35% और चौथे हफ्ते मे यह और भी कम हो जाता है लगभग 22%-25% तक उसके बाद फिल्म थियेटर मे से हटा दी जाती है। अब फिल्म मे से किसने कितना कमाया कमाई का कुल 30% तक सरकार को देना पड्ता है मनोरंजन कर का और उसके बचने के बाद वितरक और थियेटर मालिक का हिस्सा होता है जैसा की समझो फिल्म ने 100 करोड कमाई कर ली उसमे से 30% मनोरंजन कर 30 करोड अब बचे 70 करोड जिसमे से वितरक और थियेटर मालिक अपना हिस्सा लेते है करारपत्र के हिसाब से।
वितरक मल्टीप्लेक्स थियेटर से कम हिस्सा लेता है क्योंकी इसमे टिकट महंगी होती है और इन थियेटरो मे सुविधाए भी अच्छी होती है इसलिए यहाँ दर्शक आते है पैसे भी देते है जिसकी वजह से वितरक कम हिस्सा लेता है और कही-कही वितरक की मल्टीप्लेक्स थियेटर मलिको के द्वारा बात नही सुनी जाती क्योंकी थियेटर मलिको के पास अन्य विक्ल्प भी होते है यह भी कारण होता है और वही सिंगल स्क्रीन थियेटर मे एक ही स्क्रीन होती है तो थियेटर मालिको को नई- नई फिल्म ही लगानी पड्ती है इसलिए वहा थियेटर मलिक वितरक की शर्ते मान लेते है और यहा सुविधाए मल्टीप्लेक्स थियेटर के जैसी नई होने के कारण भी होता है। कई फिल्मो मे फिल्म के निर्माता ही वितरक का कार्य करते है तो फिल्म का पैसा सीधा फिल्म मालिको के पास जाता है और कही-कही फिल्म निर्माता किसी अन्य वितरक को फिल्म भी बेच सकते है ऐसे फिल्म कमाने का लाभ या हानि वितरक ही लेता है। आजकल फिल्म उद्योग मे निर्माता ही वितरक का कार्य करते है। इसके अलावा फिल्मे अपनी फिल्म किसी टीवी चैनल पर फिल्म दिखाने के भी पैसे लेते है और वह अपने फिल्म के संगीत के राईट्स बेचकर भी पैसे कमाते है।
सोमवार, 13 जनवरी 2020
WHAT IS SLR IN HINDI जानिए क्या होता है एसएलआर हिंदी मे
अगर आप इस पोस्ट या वेबसाइट से जुडे अपडेट देखना चाहते है या इस वेबसाइट के नए पोस्ट देखना चाहते है
तो आप नीचे दिए गए वेबसाइट के बटन पर क्लिक करे
SLR क्या है और यह किस तरह उपयोग मे आता है
SLR(एसएलआर) के बारे मे
एसएलआर इसका पुरा नाम स्टाटोरी लिक्विडिटी रेशो(STATORY LIQUIDITY RATIO) है और यह आरबीआई(RBI) द्वारा कमर्शिल बॅन्को(COMMERCIAL BANK) से लिया जाता है जिसके बदले मे आरबीआई कमर्शिल बॅन्को को इसपर ब्याज देती है और बॅन्को का कुछ प्रतिशत तक मुनाफा इससे भी होता है इसे नकद, सोना और आदि के रुप
मे होता है जिसे आरबीआई(RBI) अपने पास रखती है। एसएलआर हर कमर्शिल बॅन्क को आरबीआई को देना ही पडता है यह नियम है और यदि कोई बॅन्क इसे देने मे असमर्थ होता है तो उसे पेनाल्टी(PENALTY) देना पडता है।
एसएलआर(SLR) आरबीआई द्वारा क्यु लिया जाता है
यह इसलिए लिया जाता है ताकी महंगाई को नियंत्रित किया जाता है। आरबीआई एसएलआर और सीआरआर के द्वारा महंगाई को नियंत्रित करता है जिसमे सीआरआर भी महत्वपुर्ण भूमिका निभाता है और एसएलआर इसमे प्रमुख भूमिका निभाता है।
एसएलआर आरबीआई द्वारा इसलिए भी लिया जाता है ताकी बॅन्क अपने ग्राहको ज्यादा कर्ज देने से बचे ऐसा इसलिए की कई कर्ज समय सीमा के अंदर नही आने से बॅन्क को ज्यादा क्षति न हो और बॅन्क दिवालियापन की तरफ ना जाये।
आरबीआई यह कैसे करता है इसके बारे मे नीचे बताया गया है।
आरबीआई एसएलआर के द्वारा कैसे महंगाई को नियंत्रित करता है
हम आपको यह उदाहरण द्वारा समझाएंगे जैसे की मान लो देश मे नकदी ज्यादा है तो आरबीआई सीआरआर और एसएलआर का अनुपात बढा देते है इससे बॅन्क अपने पास कम राशि रख पाता है जिससे वह अपने ग्राहको के कर्जे,लोन पर ब्याज बढा देता है
जिससे ग्राहक कोई वस्तु अगर बॅन्क लोन से द्वारा लेना चाह्ता है तो नही लेता क्योकी इस समय ब्याजदर बढी हुई होती है जिससे देश और बाज़ार मे नकदी कम होती है और इससे नकदी नियत्रण मे आ जाती है ऐसा तब होता जब बाज़ार और देश मे नकदी
होती है तब ऐसा किया जाता है लेकिन जब देश और बाज़ार मे महंगाई ज्यादा होती है तो ठिक इसका उल्टा किया जाता है जैसे की इसका अनुपात कम कर दिया जाता है जिससे बॅन्क ब्याजदर कम कर देता है और ग्राहक कम ब्याजदर(INTEREST RATE) को देखकर वस्तुए
खरीदते है बाज़ार मे नकदी फैल जाती है जिससे महंगाई कम होती है।
एक और उदाहरण देते है जैसे की एक बॅन्क के पास 100 करोड की राशि है जिसमे से उसे 4% सीआरआर देना है(सीआरआर(CRR) पर कोई ब्याज नही मिलता है और न ही बॅन्क इसे आरबीआई से ले सकता है) और
उसे एसएलआर
16% तक देना है तो 100 करोड का 4% यानी की 4 करोड होता है और 16% यानी की 16 करोड होता है तो कुल मिलाकर बॅन्क को 20 करोड देना है जिसमे से उसे 16 करोड पर आरबीआई कमर्शिल बॅन्क को ब्याज देगा यह
लगभग 7%-9% तक हो सकता है चूंकी इसका अनुपात हर समय अलग-अलग होता है तो एक दम सही बताना मुश्किल है आप इसे ऑनलाईन जाकर देख सकते है।
एसएलआर(SLR) आरबीआई द्वारा क्यु लिया जाता है
यह इसलिए लिया जाता है ताकी महंगाई को नियंत्रित किया जाता है। आरबीआई एसएलआर और सीआरआर के द्वारा महंगाई को नियंत्रित करता है जिसमे सीआरआर भी महत्वपुर्ण भूमिका निभाता है और एसएलआर इसमे प्रमुख भूमिका निभाता है। एसएलआर आरबीआई द्वारा इसलिए भी लिया जाता है ताकी बॅन्क अपने ग्राहको ज्यादा कर्ज देने से बचे ऐसा इसलिए की कई कर्ज समय सीमा के अंदर नही आने से बॅन्क को ज्यादा क्षति न हो और बॅन्क दिवालियापन की तरफ ना जाये। आरबीआई यह कैसे करता है इसके बारे मे नीचे बताया गया है।
आरबीआई एसएलआर के द्वारा कैसे महंगाई को नियंत्रित करता है
हम आपको यह उदाहरण द्वारा समझाएंगे जैसे की मान लो देश मे नकदी ज्यादा है तो आरबीआई सीआरआर और एसएलआर का अनुपात बढा देते है इससे बॅन्क अपने पास कम राशि रख पाता है जिससे वह अपने ग्राहको के कर्जे,लोन पर ब्याज बढा देता है जिससे ग्राहक कोई वस्तु अगर बॅन्क लोन से द्वारा लेना चाह्ता है तो नही लेता क्योकी इस समय ब्याजदर बढी हुई होती है जिससे देश और बाज़ार मे नकदी कम होती है और इससे नकदी नियत्रण मे आ जाती है ऐसा तब होता जब बाज़ार और देश मे नकदी होती है तब ऐसा किया जाता है लेकिन जब देश और बाज़ार मे महंगाई ज्यादा होती है तो ठिक इसका उल्टा किया जाता है जैसे की इसका अनुपात कम कर दिया जाता है जिससे बॅन्क ब्याजदर कम कर देता है और ग्राहक कम ब्याजदर(INTEREST RATE) को देखकर वस्तुए खरीदते है बाज़ार मे नकदी फैल जाती है जिससे महंगाई कम होती है।
एक और उदाहरण देते है जैसे की एक बॅन्क के पास 100 करोड की राशि है जिसमे से उसे 4% सीआरआर देना है(सीआरआर(CRR) पर कोई ब्याज नही मिलता है और न ही बॅन्क इसे आरबीआई से ले सकता है) और उसे एसएलआर 16% तक देना है तो 100 करोड का 4% यानी की 4 करोड होता है और 16% यानी की 16 करोड होता है तो कुल मिलाकर बॅन्क को 20 करोड देना है जिसमे से उसे 16 करोड पर आरबीआई कमर्शिल बॅन्क को ब्याज देगा यह लगभग 7%-9% तक हो सकता है चूंकी इसका अनुपात हर समय अलग-अलग होता है तो एक दम सही बताना मुश्किल है आप इसे ऑनलाईन जाकर देख सकते है।
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